
पूर्व एसएसपी राजजीत सिंह और सब इस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह के संबंधों का खुलासा होने के बाद पंजाब सरकार लोकल रैंक देने के नियमों को सख्ती करने जा रही है। लोकल रैंक को लेकर अब नए नियम भी बनेंगे। जिस पर गृह विभाग ने काम शुरू कर दिया है।
इसके चलते राजनेताओं व अफसरशाही के चहेतों के कंधों पर चमकने वाले स्टार पर पुलिस विभाग मेहरबान नहीं हो सकेगा। क्योंकि इंद्रजीत को रेगुलर यानी पक्का हेडकाॅस्टेबल रैंक होने के चलते लोकल रैंक पहले एएसआई का 1 स्टार, सब इंस्पेक्टर के 2 स्टार और इंस्पेक्टर रैंक देकर 3 स्टार लगा दिए।
इसका फायदा उठाते हुए उसने तस्करों के साथ नेटवर्क मजबूत कर लिया। वहीं, सरकार की जांच में सामने आया कि बहुत से कर्मचारी सिफारिश के आधार पर लोकल रैंक पाकर विभिन्न अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं।
इन लोकल रैंक पाने वाले कर्मचारियों के अधिकारियों के साथ अच्छे संबंध रहे हैं और केवल इसका फायदा इन कर्मचारियों को मिला है, जबकि उनकी कोई विशेष उवलब्धि नहीं रही। लोकल रैंक पाने वाले में बहुत से कर्मचारी ऐसे भी हैं कि जिन्होंने राजनीतिक संबंधों के आधार पर लोकल रैंक हासिल किए हैं।
अब सरकार इन सबका रिव्यू करने जा रही है। इसके बाद इनको वापस उनको अपनी मूल रैंक वाली वर्दी पहननी पड़ेगी। जिससे रिव्यू के बाद राजनेताअों व अफसरों की सिफारिश व उनके डीअो लेटर की नहीं मानी जाएगी।
पंजाब सरकार ने विभिन्न जिलों से ऐसे पुलिस कर्मचारियों की सूची मांगी है, जिन्हें पिछली सरकार के दौरान और अब मौजूदा सरकार के एक साल के कार्यकाल में लोकल रैंक देकर प्रमोट किया गया है। सभी जिलों के पुलिस मुखियोें व आला अधिकारियोें से रिकॉर्ड मांगा है। बता दें कि अकाली सरकार के समय करीब 4400 और कांग्रेस के समय करीब 4700 पुलिसकर्मियों को लोकल रैंक दिया गया था। अब इनके लोकल रैंक पर असर पड़ सकता है।
लोकल रैंक मिलते ही एसएचओ व चौंकी इंचार्ज का मिल जाता है तोहफा … अधिकतर देखा गया है कि जिस कर्मचारी को लेकर रैंक दे प्रमोट किया जाता है, वह पुलिस स्टेशन का एसएचअो या चौकी का इंचार्ज की जिम्मेदारी मिल जाती है। जब आम पब्लिक को उसके असल रैंक की जानकारी नहीं होती। इसी का फायदा इंस्पेक्टर इंद्रजीत ने उठाया था।
आतंकवाद के दौर में शुरू हुआ था लोकल रैंक
आतंकवाद केे दौर में पुलिस कर्मियों को प्रोत्साहित करने को लोकल रैंक दिया जाता था ताकि आतंकवादियों को पकड़ने और उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने में सहायता मिल सके। उस समय शुरू की गई प्रक्रिया अब भी जारी है। विशेष काम के बदले लोकल रैंक का प्रावधान दिवंगत डीजीपी केपीएस गिल ने शुरू किया था।
छह महीने के लिए मान्य होता है लोकल रैंक
नियमानुसार जब भी किसी कर्मचारी को लोकल रैंक देकर प्रमोट किया जाता था तो वह केवल 6 माह के लिए मान्य होता था और 6 महीने बाद संबंधित कर्मचारी को पुन: अपने पुराने पद पर काम करना होता था। जब तक उसी सीनियोरिटी के अनुसार, प्रमोशन न हो जाए, लेकिन सीनियर्स के चलता होने के चलते ये लंबे समय तक बने रहते थे।
कब दिया जाता है लोकल रैंक..
जब कोई पुलिस कर्मचारी विशेष काम करता है यानी किसी अपराधिक मामले को हल करने के लिए ठोस सुबूत जुटा लेता है, या संबंधित अपराधी को पकड़ता या पकड़े जाने में विशेष योजना के तहत सहायता करता है तो उसे लोकल रैंक दिया जाता है।
आतंकियों की विशेष सूचना, गैंगस्टरों या उनके साथियों को पकड़ना, तस्कर को पकड़ना, तफ्तीश इतने अच्छे से करना कि अपराधियों को उस जुर्म की अदालत से सख्त सजा मिली, आदि के मामलों में संबंधित पुलिस कर्मचारी को लोक रैंक दिया जाता है।

