
डिप्रेशन के मरीजों के लिए दवाओं के साथ माइंडफुलनेस-आधारित कॉग्निटिव थेरेपी (एमबीसीटी) चिकित्सा भी कारगर होती। इस पर पीयू के मनोविज्ञान विभाग ने पीजीआई चंडीगढ़ के सहयोग से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर एक शोध किया है, जिसमें ठोस परिणाम सामने आए हैं। यह शोध पर्यवेक्षक प्रो. हरप्रीत कौर के नेतृत्व में शोधार्थी दीक्षा सचदेवा ने किया। पीजीआई चंडीगढ़ से डॉ संदीप ग्रोवर ने इस शोध कार्य के दौरान ने सह पर्यवेक्षक के रूप में कार्य किया।
चंडीगढ़ पीजीआई से डिप्रेशन के 80 अलग-अलग मामलों को दो समूहों में बांट कर हुआ शोध
दवाओं से ज्यादा असरदार होती है थैरेपी

पीजीआई चंडीगढ़ से डिप्रेशन के 80 अलग-अलग मामलों को दो समूहों में विभाजित किया गया था। एक समूह का इलाज दवाओं से किया और दूसरे समूह का इलाज एमबीसीटी दिमागीपन-आधारित संज्ञानात्मक चिकित्सा और दवाओं से किया गया। इन आंकड़ों को पहले दो महीने बाद और फिर छह महीने बाद विश्लेषण में इस्तेमाल किया गया।
पता चला कि अवसाद के रोगियों के लिए उपलब्ध दवाओं के उपयोग की स्थिति की तुलना में दवाओं के साथ थैरेपी का प्रभाव अधिक होता है। इस थैरेपी में सीखे गए मुख्य कौशल जैसे जागरूकता, दिमागीपन, भूत और भविष्य में रहने के बजाय वर्तमान में रहना, आदि को अलग-अलग सत्रों के माध्यम से रोगियों को बताया गया, जिसका अच्छा प्रभाव पड़ा।
– जैसा कि प्रो. हरप्रीत कौर ने बताया
टेली-मोड के 10-12 सत्रों में दी गई थैरेपी

शोधकर्ता दीक्षा सचदेवा ने बताया कि थैरेपी के इस्तेमाल के लिए कॉपीराइट की मंजूरी गिलफोर्ड प्रेस से ली गई थी। इस अध्ययन के महत्वपूर्ण चरण के रूप में टेली-मोड के 10-12 सत्रों के माध्यम से रोगियों को यह थैरेपी प्रदान की गई। इलाज के मामले में ठीक होने वाले मरीजों का प्रतिशत 52 रहा, जबकि केवल 22 प्रतिशत मरीज ही दवाओं के प्रयोग से ठीक हुए।
क्या है एमबीसीटी थरेपी … माइंडफुलनेस-आधारित कॉग्निटिव थेरेपी (एमबीसीटी) संज्ञानात्मक तकनीकों को माइंडफुलनेस रणनीतियों के साथ जोड़ती है ताकि व्यक्तियों को विचारों और भावनाओं को बेहतर ढंग से समझने और प्रबंधित करने में मदद मिल सके ताकि टेंशन और डिप्रेशन से राहत मिले। ध्यान की कुछ तकनीकें-श्वास मेडिटेशन, वॉकिंग मैडिटेशन, शरीर स्कैन मेडिटेशन और योग से किसी व्यक्ति की दिमागीपन में सुधार करने में मदद कर सकते हैं।

